Friday, 4 April 2014

अबकी बार मोदी सरकार


अबकी बार मोदी सरकार का संदेश देते पोस्टर, होर्डिंग आपको रोड़, बस, मेट्रो में आसानी से देखने को मिल जाएंगे। जी हां, ये पोस्टर है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के, पर अब शायद भाजपा को मोदी के नाम से पहचाना जाने लगा है तभी तो अबकी बार भाजपा की जगह मोदी सरकार का गुणगान हो रहा है। इसका कारण मोदी का भाजपा से ज्यादा मशहूर होना हो सकता है। 

नरेंद्र मोदी पिछले 10 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहें हैं और उन्होंने गुजरात में विकास के दम पर 2013 में एक बार फिर मुख्यमंत्री का पद हासिल किया। शायद यही कारण है कि मोदी से बेहतर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भाजपा को और कोई नहीं लगा। मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने में ही भाजपा में असहमति दिखने लगी इसके बावजूद भी मोदी को ही भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया। 


मोदी ने गुजरात के विकास को गुजरात मॉडल का नाम दिया, जिसका प्रयोग अक्सर आम लोग अपनी बहसों में करते दिख जाते हैं। वह कभी गुजरात गये भी न हो पर विकास का जिक्र होते ही वह ये कहने से नहीं चुकते कि देखिए गुजरात में कितना विकास हुआ है। 


भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव में आर या पार वाली भूमिका मे दिख रहीं है तभी तो डीटीसी बस स्टॉपों पर,मेट्रोकेभीतर और न जाने कहां-कहां आबकी बार मोदी सरकार का संदेश दे रहा पोस्ट्र दिख जाते हैै। वहीं अखबार, टेलीविजन, रेडियो और इंटरनेट पर मोदी के प्रचारों की मात्रा और किसी पार्टी के मुकाबले काफी अधिक हैं।
 
दूसरी तरफ सोशलसाइटों पर मोदी समर्थक मोदी के प्रचार मे लगे हैं,इसका फायदा भाजपा को यह तो हुआ है कि मोदी चार्चा का विषय बन गये है और अधिकतर लोग मोदी को जानने लगे है यह कहना गलत नही होगा कि दूसरे नेताओं की एवजमें मोदी की गुंज ज्यादा ऊँची है।जिस तरह से उत्पादित वस्तुओं का प्रचार उन्हें बेचने के लिए किया जाता है ठीक उसी तरह ये राजनीतिक पार्टियांअपना व अपने नेताओं का करते नहीं थकती।   

Tuesday, 18 February 2014

केजरीवाल का इस्तीफा


 केजरीवाल का इस्तीफा एक सोची समझी रणनीति का परिणाम है केजरीवाल को आभास हो गया था कि अगर उन्हें लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करके दिखाना है तो अपनी धूमिल होती छवि को और धूमिल होने से बचाना होगा। केजरीवाल को लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए समय की भी अवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने जनलोकपाल बिल को दिल्ली विधानसभा मे पास कराने के एवज में अपना इस्तीफा देने की घोषणा कर दी और  इस जनलोकपाल बिल को पास कराने के लिए कांग्रेस तथा भाजपा से सहयोग कि मांग भी कर दी आखिर ये पार्टियां अपने पैर पर भला कुल्हाड़ी कैसे मार सकती थी इसलिए केजरीवाल का इस्तीफा देना तो तय था। अब तो यह देखना होगा कि अरविंद केजरीवाल का यह फैसला उन्हें लोकसभा मे कितनी सीटे दिला पाएगा।

Wednesday, 12 February 2014

             यातायात नियमों के पालन मे लापरवाही

हम अक्सर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए यातायात साधनों का प्रयोग करते है इनमे हम सार्वजनिक साधनों व निजी साधनों का प्रयोग करते है। शहर की इस भाग-दौड़ भरी जिन्दगीं मे किसी भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को देखने का समय नहीं हैं। दिल्ली मे अधिक संख्या मे लोग डीटीसी बस का प्रयोग करते है ये बसे पूरी तरह से भरी रहती है और इन बसों के चालक तो बस को इस तरह से चलाते है मानो  कोई स्पोर्टस कार चला रहे हों। यही हाल दिल्ली कि लाईफ लाईन कहीं जाने वाली दिल्ली मेट्रो का है इसके सभ्य यात्री तो इसमे चढ़ने वाले यात्रियों को मेट्रो से उतरने व उसमें चढने का मौका ही नहीं देते है।

सड़क पर हम स्कूटर,मोटर साईकल और कार चालकों को धड़ले से यातायात नियमों का उल्घन करते देख सकते हैं। क्योकि शायद वाहन चालकों को इन यातायात नियमों की कोई परवाह ही नहीं है हर किसी को इतनी जल्दी है कि वह लाल बत्ती पर रूकना अपने समय कि बर्बादी समझता है और ज़ेबरा क्रॉसिंग से पहले रूकना तो इन चालकों को आता ही नही या यू कहे कि उनके ब्रेक ज़ेब्रा क्रॉसिंग के बाद ही काम करते है।

यातायात नियमों का उल्लघंन वाहन चालक ही नही करते इसमें नियमो का पालन कराने वाले भी भागीदार होते है। क्योंकि वह जब नियम तोड़ने वाले चालक को पकड़ते है तो उस पर दण्ड न लगाकर कुछ रूपये लेकर छोड़ देते है। इस कृत्य मे पैदल चलने वाले लोग भी शामिल हैं। ये सड़क पार करने के लिये सबवें,पूल और ज़ेबरा क्रॉसिंग का प्रयोग करना तो आता ही नहीं जहां से थोड़ी जगह दीखी वहीं से सड़क पार कर ली। इसके कारण ही रोज कोई न कोई सड़क दूर्घटना मे मारा जाता हैं।
                  
           

सड़क पर होने वाली दूर्घटनाओं का मुख्य कारण सड़क पर पैदल चलने वाले लोग व वाहन चालकों का यातायात नियमों का पालन न करना है। नियमों का पालन करना हर एक नागरिक का कर्तव्य साथ ही उसका नैतिक धर्म भी।

  

Wednesday, 22 January 2014

उम्मीदों के बोझ तले आप

प की सरकार को सत्ता में आए अभी एक महीना भी नहीं हुआ लेकिन यह सरकार मीडिया की वजह से लगातार जनता की नज़रों में है। आम आदमी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में दिल्ली को बेहतर एवं भ्रष्टाचार मुक्त बनाने हेतु कई वादे किए थे। लेकिन पार्टी द्वारा  जल्दबाजी मे लिए गए फैसलों के चलते एक बार फिर यह पार्टी मीडिया मे छाई है वहीं सोशल मीडिया पर आम जनता इसके फैसले की आलोचना कर रही है। दूसरी तरफ टेलीविजन चैनलों पर भाजपा और कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता आम आदमी पार्टी पर तीखे वार करते दिख रहे है। बुद्धिजीवी भी आप के इस कदम को गलत बता रहे है।
आप पार्टी के मुख्यमंत्री और कानून मंत्री, केंद्र के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस के खिलाफ कार्यवाही करने को लेकर धरने पर बैठे है। इनका कहना है कि दिल्ली पुलिस अपना कार्य सही तरीके से नही करती। हाल ही में पहाड़गंज में विदेशी महिला के साथ हुए बलात्कार,सागरपुर में एक महिला का जलाया जाना तथा मालवीय नगर में सेक्स रैकेट एंव ड्रग का पता चलने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने इसमें अपनी सक्रियता नहीं दिखाई। इस पर, दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने छापे मारे। इस मामले ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है।
उपर्युक्त मामलों में दिल्ली पुलिस के ढुलमुल रवैये की वजह से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस के तीन एसएचओ को पद-मुक्त करने की माँग की, जिसे गृहमंत्री ने मानने से इकार कर दिया। इस पर केजरीवाल अपनी बात मनवाने हेतु धरने का रास्ता अपनाया। अपने इस कदम का कारण उन्होंने प्रशासनिक प्रक्रिया का लम्बा होना बताया। लगभग दो दिन चले इस धरने का अंत होने पर आप के नेता योगेंद्र यादव ने दिल्ली के राज्यपाल से मुलाकात की। लेकिन राज्यपाल ने एसएचओ को पदमुक्त करने से इन्कार कर दिया और कहा कि मालवीय नगर के एसएचओ को जाँच होने तक पद से हटा दिया गया है। वही पहाड़गंज के पीसीआर इंचार्ज को कुछ समय के लिए छुट्टी दे दी गई है।

केजरीवाल ने अपने धरने का अंत करते हुए कहा कि एक बार फिर दिल्ली की जनता विजयी हुई है। मजे कि बात यह है कि दिल्ली की जनता यह सवाल उठा रही है कि आखिर इस धरने से फायदा किसे हुआ। क्योंकि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने जो मांग रखी थी उसे गृह मंत्री ने मानने से इनकार कर दिया। केजरीवाल को अराजक और फासीवादी की संज्ञा भी दी जा रही है पर कोई एक व्यक्ति दोनों कैसे हो सकता है जबकि दोनों शब्दों के मायने अलग-अलग है। एक तरफ अराजक व्यक्ति  जहां किसी तरह सरकार मे विश्वास नहीं रखता वहीं फासीवदी येन केन प्रकारेण खुद ही सरकार बने रहना चहते हैं।