Monday, 15 August 2016

आसमान से गायब होते रंग!

आसमान को हर इंसान देखता है और हरेक का मन इस आसमान में उड़ान भरने का करता है. अपने मन को हम पतंग के साथ बांधकर खुद के उड़ाने की ख्वाहिश को हवा देने की कोशिश करते हैं. जब पतंग आसमान की कोख में उड़ती है, तो पतंगबाज भी अपनी भावनाओं के साथ उस आसमान रूपी कोख में करवटें भरता है.

पतंग, मन की तरह होती हैं, ये भावनाओं के साथ उड़ती है. कभी ऊंचाई पर पहुंच कर हमें खुशी का एहसास दिलती है, तो कभी कटकर दुख का. जब हाथ में मांझे (पेच लड़ाने की डोर) की डोर खत्म होकर सद्दी (सफ़ेद डोर) पर आती है, तो दिल खुश होकर कहता, देख-बे-देख कितनी ऊंची पहुंचा दी, तेरे भाई ने और जब नज़रों की तरह पतंग के पेंच लड़ते हैं, तो खैंच और ढील का तालमेल आपको दूसरों की पतंग काटने में उस्ताद बना देता है. अपने आस-पास की पतंगों को ज़मीन पर गिराने के बाद जो आई बो की आवाज़ सुनाई देती है, यकीनन वो एक पतंगबाज में उत्साह भरने का ही काम करती हैं.

इन्हीं यादों को सोचते हुए जब कदम पुरानी दिल्ली की पुरानी-सी गलियों से होकर लालकुआं पहुंचे, तो मैं और मेरे कांधे टंगा कैमरा पतंगों से भरी दुकानों को देखता ही रह गया. मुझे ऐसे लग रहा था जैसे मेरा माजी (अतीत) मेरे सामने हो. 15 अगस्त पर पतंगे उड़ाकर आज़ादी का एहसास हर कोई करता है, ये 15 अगस्त का त्यौहार पुरानी दिल्ली में लगभग हमेशा ही बना रहता है, वहां उड़ने वाली पतंगें इस दिन का शिद्दत से इंतज़ार नहीं करती, पर इस बार 15 अगस्त से पहले पतंगों का बाज़ार, लालकुआं की दुकानें खाली-खाली लग रही थीं. इन दुकानों और रंग बिरंगी, छोटी-बड़ी पतंगों को देखकर एक बार फिर मन बचपन को माजे के साथ बांधकर उड़ाने को तैयार था, पर दिल उदास भी था, क्योंकि वहां वो भीड़ और चहल-पहल नहीं थी, जिसे मैं बचपन में देखा करता था.


शायद वो दौर ही था, जब लोगों में पतंगबाजी का शौक़ हुआ करता था. भले ही धूप क्यों न हो, पर छत्त पर अगर चढ़ गए तो शाम में ही उतरना होता था. वहीं खाना और तरह-तरह की चीज़ें पहुंच जाया करती थी. चाचा, मामा के लड़के और दोस्तों की टोली हर कोने को घेरकर पतंग उड़ाने का लुत्फ़ उठाते थे. कुछ तो सिर्फ़ चर्खी पकड़ने और कन्नै देने के लिए होते थे, क्योंकि भैया, उन्हें पतंग उड़ाने नहीं आती थी, लेकिन इसी काम को करते-करते वो एक दिन पतंगबाज हो जाते थे. हालांकि इस टोली में एक सबसे बड़ा पतंगबाज़ भी होता था, जो हर किसी की मदद करता था, पतंग को एक मुक्कमल ऊंचाई पर पहुंचाने में. पतंग का वो दौर यादगार ही नहीं, मज़ेदार भी हुआ करता था.


खैर, बात करते हैं लालकुआं बाज़ार की, कागज़-प्लास्टिक और रंग-बिरंगी पतंगों के साथ पीएम मोदी की तस्वीरों के साथ अच्छे दिन आ गए स्लोगन के साथ भी पतंगे दुकानों में टंगी दिखाई दीं. अब ये व्यंग्य है या सच्चाई, इसका फैसला तो उड़ाने वाले खुद ही कर लेंगे. इसके अलावा फैसला आसमान भी कर सकता है. सिर्फ़ मोदी ही नहीं, बॉलीवुड के भाई (सलमान) और कार्टून की दुनिया के बेताज बादशाह डोरेमॉन और नोबिता भी इन पर छपे हैं. दुकान के बाहर लटकी इन पतंगों का आकार छोटा ही नहीं, बड़ा (10 मीटर) भी है, जिन्हें हम छप्पर भी कहते थे.

पतंगों से अटी ये दुकानें बड़ी रंग-बिरंगी लगती है, यहां मांजा भी है और सद्दी भी और इन्हें खुद में लपेटकर रखने वाली चर्खी भी. बस ज़रूरत है तो कुछ पतंग के शौकीन लोगों की, जो यहां आएं और इन्हें ले जाकर हवा में लहराएं. पर लगता है कि इस ज़िंदगी में पतंग उड़ाने का शौक़ लोगों में कम हो गया हैं, नहीं तो पुरानी दिल्ली का आसमान इतना सूना-सूना न दिखता.


हालांकि मैं आज तक ये नहीं जान पाया कि भारत में 15 अगस्त के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? पर शायद इस 15 अगस्त पर भी राजधानी दिल्ली का आसमान एक बार फिर पतंगों से भरा दिखाई देगा.

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