Monday, 15 August 2016

उसका साइड फेस और उसे देखने की मेरी कोशिश

अचानक से मेरी निगाहें उसके साइड फेस पर ठहर जाती हैं, वो इतना ख़ूबसूरत है कि इच्छा पूरा चेहरा देखने की होने लगी. मैं मन ही मन चाह रहा था कि वो किसी भी तरह से अपना चेहरा एक बार मेरी तरफ़ घुमाए, ताकि मैं उसे देख सकूं. खैर, मन की बातें इतनी ऊंची आवाज़ में थोड़े ही होती हैं कि उन्हें सुनकर वो अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमा लेती.
उसकी नज़रें हाथ में मौजूद अंग्रेजी की मोटी किताब पर थीं, और मेरी निगाहें उसे छुप-छुपकर देख रही थीं. उसके दोनों कंधों पर झोले की तरह के बैग टंगे थे. इतने में मेट्रो में अनाउसमेंट होती है, अगला स्टेशन हौज़ खास है, ‘दरवाज़े दाईं तरफ़ से खुलेंगे’. वो पिछले कुछ स्टेशन्स से दाईं ओर के दरवाज़े के पास खड़ी थी, जहां से लोगों का उतरना-चढ़ना निरंतर जारी था.
मैं बाईं ओर के दरवाज़े की तरफ़ खड़ा उसे निहार रहा था. कभी वो पढ़ते-पढ़ते आंखों पर आए बालों को फिर से कान के पीछे लगा देती. तो कभी खुद को मेट्रो में चढ़ती भीड़ से बचाती. मैं ये सब कुछ देख रहा था कि इतने में वो मेरी तरफ़ बढ़ती है. मैं अचानक से सकपका गया. पर वो बालों को खोलते हुए मेरे सामने आकर खड़ी हो जाती है. अब मैं और वो बिलकुल आमने-सामने थे. लेकिन कम्बख़्त मैं खड़ा भी ऐसे था कि मुझे उसका एकतरफा चेहरा ही दिख रहा था. मुझे उसका पूरा चेहरा दिखे, इसके लिए मैंने अपनी शरीर की स्थिति बड़ी चतुराई से बदल दी. अब हम दोनों के चेहरे बिलकुल आमने-सामने थे. पर उसकी निगाहें अब भी किताब पर थीं, वो इतिहास की किताब थी और उसके साइड में लटके एक झोले पर जयपुर लिटरेचर फेस्ट लिखा था, जो मुझे साफ़ दिख रहा था.
हां, उसका सांवला चेहरा बिलकुल मुकम्मल था. न आंखें बड़ी या छोटी थीं. न नाक लंबी और ऊंची थी. उसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से मालूम हो रहे थे, जो शायद किताब में लिखे शब्दों को बुदबुदा रहे थे. बाल रेशम के धागों से लग रहे थे, जिनमें एक ज़िद थी कि वो उसकी आंखों पर आना नहीं छोड़ेंगे. भले ही वो उन्हें कितनी ही बार पीछे कर ले. खैर, उसकी आंखों का काजल और बालों का बार-बार आंखों पर गिरना ही था, जो मुझे उसका मुरीद बना रहा था. यकीनन वो खुले बालों में किसी सुंदरी से कम नहीं दिख रही थी.
मुझे याद है कि हम दोनों की नज़रें दो से तीन बार आपस में टकराई थीं. शायद उसे एहसास हो गया था कि मैं उसे चोरी-छिपे देख रहा हूं. उसने अचानक ही किताब को बैग में रख दिया और अपने खुले बालों को बांधने लगी. ये देखकर मुझे आभास हो गया था कि वो अगले स्टेशन पर उतर जाएगी. मैं उसे पहली बार देख रहा था, इसके बावजूद मन चाह रहा था कि वो यूं ही मेरे सामने खड़ी रहे. एक बार को मन हुआ कि साथ में ही उतर लिया जाए और बात की जाए, पर मन की इस बात को मन में ही रखते हुए मैं दरवाज़े के उस कोने में ही खड़ा रहा. पता नहीं उसने मुझे देखा भी या नहीं, पर मैंने उसे तब तक ज़रूर देखा, जब तक वो स्टेशन की सीढ़ियों से नीचे न उतर गई.
ऑफ़िस पहुंचने तक उसकी छवि मेरी आंखों में बसी रही. खैर, पता नहीं उससे कभी मुलाक़ात होगी भी या नहीं. पर हां, वो चेहरा कुछ समय तक तो मेरी आंखों में ज़रूर बसा रहेगा, वो आंखें भी जिनका नशा अब भी है.

आसमान से गायब होते रंग!

आसमान को हर इंसान देखता है और हरेक का मन इस आसमान में उड़ान भरने का करता है. अपने मन को हम पतंग के साथ बांधकर खुद के उड़ाने की ख्वाहिश को हवा देने की कोशिश करते हैं. जब पतंग आसमान की कोख में उड़ती है, तो पतंगबाज भी अपनी भावनाओं के साथ उस आसमान रूपी कोख में करवटें भरता है.

पतंग, मन की तरह होती हैं, ये भावनाओं के साथ उड़ती है. कभी ऊंचाई पर पहुंच कर हमें खुशी का एहसास दिलती है, तो कभी कटकर दुख का. जब हाथ में मांझे (पेच लड़ाने की डोर) की डोर खत्म होकर सद्दी (सफ़ेद डोर) पर आती है, तो दिल खुश होकर कहता, देख-बे-देख कितनी ऊंची पहुंचा दी, तेरे भाई ने और जब नज़रों की तरह पतंग के पेंच लड़ते हैं, तो खैंच और ढील का तालमेल आपको दूसरों की पतंग काटने में उस्ताद बना देता है. अपने आस-पास की पतंगों को ज़मीन पर गिराने के बाद जो आई बो की आवाज़ सुनाई देती है, यकीनन वो एक पतंगबाज में उत्साह भरने का ही काम करती हैं.

इन्हीं यादों को सोचते हुए जब कदम पुरानी दिल्ली की पुरानी-सी गलियों से होकर लालकुआं पहुंचे, तो मैं और मेरे कांधे टंगा कैमरा पतंगों से भरी दुकानों को देखता ही रह गया. मुझे ऐसे लग रहा था जैसे मेरा माजी (अतीत) मेरे सामने हो. 15 अगस्त पर पतंगे उड़ाकर आज़ादी का एहसास हर कोई करता है, ये 15 अगस्त का त्यौहार पुरानी दिल्ली में लगभग हमेशा ही बना रहता है, वहां उड़ने वाली पतंगें इस दिन का शिद्दत से इंतज़ार नहीं करती, पर इस बार 15 अगस्त से पहले पतंगों का बाज़ार, लालकुआं की दुकानें खाली-खाली लग रही थीं. इन दुकानों और रंग बिरंगी, छोटी-बड़ी पतंगों को देखकर एक बार फिर मन बचपन को माजे के साथ बांधकर उड़ाने को तैयार था, पर दिल उदास भी था, क्योंकि वहां वो भीड़ और चहल-पहल नहीं थी, जिसे मैं बचपन में देखा करता था.


शायद वो दौर ही था, जब लोगों में पतंगबाजी का शौक़ हुआ करता था. भले ही धूप क्यों न हो, पर छत्त पर अगर चढ़ गए तो शाम में ही उतरना होता था. वहीं खाना और तरह-तरह की चीज़ें पहुंच जाया करती थी. चाचा, मामा के लड़के और दोस्तों की टोली हर कोने को घेरकर पतंग उड़ाने का लुत्फ़ उठाते थे. कुछ तो सिर्फ़ चर्खी पकड़ने और कन्नै देने के लिए होते थे, क्योंकि भैया, उन्हें पतंग उड़ाने नहीं आती थी, लेकिन इसी काम को करते-करते वो एक दिन पतंगबाज हो जाते थे. हालांकि इस टोली में एक सबसे बड़ा पतंगबाज़ भी होता था, जो हर किसी की मदद करता था, पतंग को एक मुक्कमल ऊंचाई पर पहुंचाने में. पतंग का वो दौर यादगार ही नहीं, मज़ेदार भी हुआ करता था.


खैर, बात करते हैं लालकुआं बाज़ार की, कागज़-प्लास्टिक और रंग-बिरंगी पतंगों के साथ पीएम मोदी की तस्वीरों के साथ अच्छे दिन आ गए स्लोगन के साथ भी पतंगे दुकानों में टंगी दिखाई दीं. अब ये व्यंग्य है या सच्चाई, इसका फैसला तो उड़ाने वाले खुद ही कर लेंगे. इसके अलावा फैसला आसमान भी कर सकता है. सिर्फ़ मोदी ही नहीं, बॉलीवुड के भाई (सलमान) और कार्टून की दुनिया के बेताज बादशाह डोरेमॉन और नोबिता भी इन पर छपे हैं. दुकान के बाहर लटकी इन पतंगों का आकार छोटा ही नहीं, बड़ा (10 मीटर) भी है, जिन्हें हम छप्पर भी कहते थे.

पतंगों से अटी ये दुकानें बड़ी रंग-बिरंगी लगती है, यहां मांजा भी है और सद्दी भी और इन्हें खुद में लपेटकर रखने वाली चर्खी भी. बस ज़रूरत है तो कुछ पतंग के शौकीन लोगों की, जो यहां आएं और इन्हें ले जाकर हवा में लहराएं. पर लगता है कि इस ज़िंदगी में पतंग उड़ाने का शौक़ लोगों में कम हो गया हैं, नहीं तो पुरानी दिल्ली का आसमान इतना सूना-सूना न दिखता.


हालांकि मैं आज तक ये नहीं जान पाया कि भारत में 15 अगस्त के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? पर शायद इस 15 अगस्त पर भी राजधानी दिल्ली का आसमान एक बार फिर पतंगों से भरा दिखाई देगा.

उसके सपने की भी मौत!

गाड़ी से उतरने के तुरंत बाद संदीप की नज़रें अपनी प्रेमिका को खोजने के लिए इधर-उधर दौड़ाती हैं, लेकिन जब उसे वो कहीं नहीं दिखाई देती, तो संदीप तुरंत जेब से मोबाइल निकालकर उसे फ़ोन मिलाता है. पर इतने में ऋतु (उसकी प्रेमिका) अचानक पीछे से आकर संदीप को चौंका देती है!

संदीप: कहां थी? पता है, मैं कितनी देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं?

ऋतु: सॉरी बाबा, वो जाम लगा था ना, इसलिए लेट हो गई. अरे, यूं ही बाहर खड़े रहोगे कि कैफ़े के अंदर भी चलोगे. ऋतू ने प्यार से धक्का देते हुए संदीप से कहां, वहीं बैठ कर अपना गुस्सा उतार लेना, अब चलो!


दोनों कैफ़े में बैठे ही थे कि आस-पास मौजूद लोग संदीप को घूरने लगे. संदीप को पता था कि वे सभी उसे क्यों घूर रहे हैं. कुछ लोग तो संदीप के साथ सेल्फ़ी लेने की कोशिश करने लगे, तो कुछ उसका ऑटोग्राफ़ लेने की. संदीप एक प्रसिद्ध सीरियल में मुख्य किरदार निभा रहा है. इतना सब कुछ चल ही रहा था कि अचानक संदीप को ऐसा लगा मानो कोई उसकी पीठ में कुछ चुभा रहा हो. संदीप एकाएक सकपका जाता है और खुद को शानदार कैफ़े से सड़क किनारे फुटपाथ पर पाता है. उसके आस-पास मौजूद फैन्स की भीड़ और उसकी प्रेमिका  गायब हो चुकी थी. पर गुस्सैल आवाज़ में उसे सुनाई देता है उठ बे... मुझे झाड़ू लगाने दे, कब तक यहां पड़ा रहेगा. संदीप को एहसास हुआ कि वो आज भी रोज की तरह अपने ख़्वाब को सपने में ही जी रहा था. फुटपाथ पर बिछी मटमैली चादर को बटोरने के बाद वो रोज़ की तरह चल दिया था, कूड़ा उठाने के काम पर.