अचानक से मेरी निगाहें उसके साइड फेस पर ठहर जाती हैं, वो इतना ख़ूबसूरत है कि इच्छा पूरा चेहरा देखने की होने लगी. मैं मन ही मन चाह रहा था कि वो किसी भी तरह से अपना चेहरा एक बार मेरी तरफ़ घुमाए, ताकि मैं उसे देख सकूं. खैर, मन की बातें इतनी ऊंची आवाज़ में थोड़े ही होती हैं कि उन्हें सुनकर वो अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमा लेती.
उसकी नज़रें हाथ में मौजूद अंग्रेजी की मोटी किताब पर थीं, और मेरी निगाहें उसे छुप-छुपकर देख रही थीं. उसके दोनों कंधों पर झोले की तरह के बैग टंगे थे. इतने में मेट्रो में अनाउसमेंट होती है, अगला स्टेशन हौज़ खास है, ‘दरवाज़े दाईं तरफ़ से खुलेंगे’. वो पिछले कुछ स्टेशन्स से दाईं ओर के दरवाज़े के पास खड़ी थी, जहां से लोगों का उतरना-चढ़ना निरंतर जारी था.
मैं बाईं ओर के दरवाज़े की तरफ़ खड़ा उसे निहार रहा था. कभी वो पढ़ते-पढ़ते आंखों पर आए बालों को फिर से कान के पीछे लगा देती. तो कभी खुद को मेट्रो में चढ़ती भीड़ से बचाती. मैं ये सब कुछ देख रहा था कि इतने में वो मेरी तरफ़ बढ़ती है. मैं अचानक से सकपका गया. पर वो बालों को खोलते हुए मेरे सामने आकर खड़ी हो जाती है. अब मैं और वो बिलकुल आमने-सामने थे. लेकिन कम्बख़्त मैं खड़ा भी ऐसे था कि मुझे उसका एकतरफा चेहरा ही दिख रहा था. मुझे उसका पूरा चेहरा दिखे, इसके लिए मैंने अपनी शरीर की स्थिति बड़ी चतुराई से बदल दी. अब हम दोनों के चेहरे बिलकुल आमने-सामने थे. पर उसकी निगाहें अब भी किताब पर थीं, वो इतिहास की किताब थी और उसके साइड में लटके एक झोले पर जयपुर लिटरेचर फेस्ट लिखा था, जो मुझे साफ़ दिख रहा था.
हां, उसका सांवला चेहरा बिलकुल मुकम्मल था. न आंखें बड़ी या छोटी थीं. न नाक लंबी और ऊंची थी. उसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से मालूम हो रहे थे, जो शायद किताब में लिखे शब्दों को बुदबुदा रहे थे. बाल रेशम के धागों से लग रहे थे, जिनमें एक ज़िद थी कि वो उसकी आंखों पर आना नहीं छोड़ेंगे. भले ही वो उन्हें कितनी ही बार पीछे कर ले. खैर, उसकी आंखों का काजल और बालों का बार-बार आंखों पर गिरना ही था, जो मुझे उसका मुरीद बना रहा था. यकीनन वो खुले बालों में किसी सुंदरी से कम नहीं दिख रही थी.
मुझे याद है कि हम दोनों की नज़रें दो से तीन बार आपस में टकराई थीं. शायद उसे एहसास हो गया था कि मैं उसे चोरी-छिपे देख रहा हूं. उसने अचानक ही किताब को बैग में रख दिया और अपने खुले बालों को बांधने लगी. ये देखकर मुझे आभास हो गया था कि वो अगले स्टेशन पर उतर जाएगी. मैं उसे पहली बार देख रहा था, इसके बावजूद मन चाह रहा था कि वो यूं ही मेरे सामने खड़ी रहे. एक बार को मन हुआ कि साथ में ही उतर लिया जाए और बात की जाए, पर मन की इस बात को मन में ही रखते हुए मैं दरवाज़े के उस कोने में ही खड़ा रहा. पता नहीं उसने मुझे देखा भी या नहीं, पर मैंने उसे तब तक ज़रूर देखा, जब तक वो स्टेशन की सीढ़ियों से नीचे न उतर गई.
ऑफ़िस पहुंचने तक उसकी छवि मेरी आंखों में बसी रही. खैर, पता नहीं उससे कभी मुलाक़ात होगी भी या नहीं. पर हां, वो चेहरा कुछ समय तक तो मेरी आंखों में ज़रूर बसा रहेगा, वो आंखें भी जिनका नशा अब भी है.

