Wednesday, 22 January 2014

उम्मीदों के बोझ तले आप

प की सरकार को सत्ता में आए अभी एक महीना भी नहीं हुआ लेकिन यह सरकार मीडिया की वजह से लगातार जनता की नज़रों में है। आम आदमी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में दिल्ली को बेहतर एवं भ्रष्टाचार मुक्त बनाने हेतु कई वादे किए थे। लेकिन पार्टी द्वारा  जल्दबाजी मे लिए गए फैसलों के चलते एक बार फिर यह पार्टी मीडिया मे छाई है वहीं सोशल मीडिया पर आम जनता इसके फैसले की आलोचना कर रही है। दूसरी तरफ टेलीविजन चैनलों पर भाजपा और कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता आम आदमी पार्टी पर तीखे वार करते दिख रहे है। बुद्धिजीवी भी आप के इस कदम को गलत बता रहे है।
आप पार्टी के मुख्यमंत्री और कानून मंत्री, केंद्र के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस के खिलाफ कार्यवाही करने को लेकर धरने पर बैठे है। इनका कहना है कि दिल्ली पुलिस अपना कार्य सही तरीके से नही करती। हाल ही में पहाड़गंज में विदेशी महिला के साथ हुए बलात्कार,सागरपुर में एक महिला का जलाया जाना तथा मालवीय नगर में सेक्स रैकेट एंव ड्रग का पता चलने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने इसमें अपनी सक्रियता नहीं दिखाई। इस पर, दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने छापे मारे। इस मामले ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है।
उपर्युक्त मामलों में दिल्ली पुलिस के ढुलमुल रवैये की वजह से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस के तीन एसएचओ को पद-मुक्त करने की माँग की, जिसे गृहमंत्री ने मानने से इकार कर दिया। इस पर केजरीवाल अपनी बात मनवाने हेतु धरने का रास्ता अपनाया। अपने इस कदम का कारण उन्होंने प्रशासनिक प्रक्रिया का लम्बा होना बताया। लगभग दो दिन चले इस धरने का अंत होने पर आप के नेता योगेंद्र यादव ने दिल्ली के राज्यपाल से मुलाकात की। लेकिन राज्यपाल ने एसएचओ को पदमुक्त करने से इन्कार कर दिया और कहा कि मालवीय नगर के एसएचओ को जाँच होने तक पद से हटा दिया गया है। वही पहाड़गंज के पीसीआर इंचार्ज को कुछ समय के लिए छुट्टी दे दी गई है।

केजरीवाल ने अपने धरने का अंत करते हुए कहा कि एक बार फिर दिल्ली की जनता विजयी हुई है। मजे कि बात यह है कि दिल्ली की जनता यह सवाल उठा रही है कि आखिर इस धरने से फायदा किसे हुआ। क्योंकि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने जो मांग रखी थी उसे गृह मंत्री ने मानने से इनकार कर दिया। केजरीवाल को अराजक और फासीवादी की संज्ञा भी दी जा रही है पर कोई एक व्यक्ति दोनों कैसे हो सकता है जबकि दोनों शब्दों के मायने अलग-अलग है। एक तरफ अराजक व्यक्ति  जहां किसी तरह सरकार मे विश्वास नहीं रखता वहीं फासीवदी येन केन प्रकारेण खुद ही सरकार बने रहना चहते हैं। 

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